उत्तराखंड के उत्तरकाशी में मुसलमानों के ठिकानों

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में मुसलमानों के ठिकानों पर हमला हो रहा है. मुसलमानों को शहर छोड़ने की चेतावनी दी गई है. कई परिवार भाग चुके हैं.

मुझे आज से पच्चीस साल पहले की एक घटना याद आ रही है. महीना यही जून का था. हमारे एक दोस्त की शादी उत्तरकाशी में थी. हम कुछ मित्र मेरी पुरानी टूटी-फूटी फ़ीयट कार में बैठ कर पहुंच गए. कार वहाँ जा कर ख़राब हो गई. शादी के अगले दिन हम लोगों का प्रोग्राम बना गंगोत्री जाने का. हम लोग एक जीप में चढ़ गए. जीप वाला भाड़ा लेकर सवारी ले जाता था.

हमारे साथ उस जीप में एक बुज़ुर्गवार मुसलमान थे. दाढ़ी रखी थी और जालीदार टोपी पहने थे. साथ में एक मोटा गट्ठर था. मैंने पूछा, "भाईसाहब, कहाँ जा रहे हैं?" नरम आवाज़ में सीधे-सादे अंदाज़ में बोले, "भाईजी, हमने सुना है गंगोत्री में ठंड पड़ती है तो कोट बेचने जा रहे हैं." जीप खुली थी. उसमें क़रीब आठ लोग बैठे थे. बाक़ी सभी हिंदू थे. गंगोत्री में दर्शन करने जा रहे थे. एक नवविवाहित जोड़ा था. पत्नी की माँग में मोटा सिंदूर था. पति ने भगवा अँगोछा पहना था. 

गंगोत्री में उतर कर वहाँ गंगा तक जाने का एक संकरा रास्ता था. शायद अभी भी हो. उस रास्ते के दोनों ओर गुमटियाँ थीं. मुसलमान भाई उन गुमटियों के दुकानदारों को कोट बेचने की कोशिश करने लगे. हम मित्र आगे बढ़ कर नदी में कूद कर नहाने लगे.

लौट कर आए तो देखा मुसलमान भाई साइड में ज़मीन पर बैठे हैं. मैंने पूछा बेच लिया? बोले नहीं भाई, यहाँ किसी ने ख़रीदा नहीं. मैं भी जवानी में ड्रामेबाज़ था. मैंने कहा आपसे नहीं होगा. मैंने चार-पाँच कोट उठा लिए और एक एक दुकान जाकर बेचने लगा. तीन बेच डाले. पैसे बुज़ुर्ग को दे दिए. फिर हम लोग उसी जीप में बैठ कर वापस उत्तरकाशी आ गए. वो हिंदू नवविवाहित जोड़ा भी. रास्ते में सब हंस रहे थे कि मैंने कोट बेचे. बुज़ुर्ग भी मुस्करा रहे थे. रास्ते में रुक कर हम लोगों ने चाय वग़ैरह पी. सब आपस में दोस्त हो गए थे. उत्तरकाशी पहुँच कर ड्राइवर और भगवा अँगोछे वाले आदमी ने मुसलमान बुज़ुर्ग का गट्ठर उतारने में मदद की.

पता चला बुज़ुर्गवार का अगले दिन ऋषिकेश जाने का प्लान था. मैंने पूछा क्यों? सादगी से बोले, "भाई, सुना है वहाँ ठंड पड़ती है. शायद लोग कोट ख़रीद लें." मैंने कहा हम भी कल दिल्ली लौट रहे हैं आप हमारे साथ चलिए. वो झिझक रहे थे. लेकिन हम लोगों ने आग्रह किया.

उस रात तक लोकल मैकेनिक ने फ़ीयट ठीक कर दी. अगली सुबह हम लोग उत्तरकाशी बस स्टैंड पर पहुंच गए. बुज़ुर्ग अपने गट्ठर के साथ वहाँ पहले से मौजूद थे. हमने रस्सी ले रखी थी. फ़ीयट के ऊपर गट्ठर बांध दिया. अगले कुछ घटों में हम लोग मौज-मस्ती करते हुए ऋषिकेश पहुँच गए. पूरे रास्ते बुज़ुर्ग मुस्कराते हुए हम लोगों की चकल्लस झेलते रहे. ऋषिकेश पहुँचने पर हमने उनको हाईवे पर साइड में उतार दिया. हमें सीधे जाना था. उनको शहर में जाना था. उन्होंने जेब से पॉलिथीन की छोटी सी थैली निकाली. उसमें रुपए थे. वो गिनकर हमें रुपए देने लगे. मैंने हँस कर उनका हाथ पकड़ के रोक दिया. उन्होंने मेरे घर का फ़ोन नंबर लिया. उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन नहीं होते थे.

छह-सात महीने बीत गए. एक दिन उनका फ़ोन आया. मुझे बात करके बहुत अच्छा लगा. बोले भाई, मैं दिल्ली आया हूँ आपसे मिलने आऊँ क्या. मैंने कहा ज़रूर. दोपहर बाद वो घर आए. मैंने चाय नाश्ते का आग्रह किया. वो बोले रमज़ान है मैं रोज़े से हूँ. कुछ देर बातचीत करते रहे. फिर बोले, भाई, आप उत्तरकाशी में अपनी माँ के बार में बात कर रहे थे. आपने बताया था कि वो इलाहाबाद में रहती हैं. इलाहाबाद में काफ़ी ठंड पड़ती है. मैं आपकी माताजी के लिए एक कोट लाया हूँ. उन तक पहुँचा दीजिए.

उसके बाद दो एक साल कभी कभी उनसे फ़ोन पर बात हो जाती थी. फिर उनके फ़ोन आने बंद हो गए. मेरी फूटी क़िस्मत कि मुझे आज उनका नाम याद नहीं है. न मुझे ये याद है कि वो कहाँ के रहने वाले थे. उस समय वो पचास से ऊपर रहे होंगे. आज पचहत्तर के होने चाहिए. सोचता हूँ क्या उनको मेरी याद होगी? क्या उनको यक़ीन होगा कि मैं आज भी उनका हमदर्द हूँ? क्या उनका अब भी उत्तरकाशी जाना होता होगा?

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