हर खेल में हार-जीत तो चलती ही रहती है। फिर भी टीम इंडिया यह टैस्ट मैच 50

● टीम इंडिया बुरी तरह हारी 🏏

हर खेल में हार-जीत तो चलती ही रहती है। फिर भी टीम इंडिया यह टैस्ट मैच 50-60-80-100 रनों तक हार जाती तो भी चलता। मगर 209 रनों से हार! इसे तो बड़ी हार ही कहा जा सकता है।

इसी बहाने आज लोग सचिन तेंदुलकर को याद कर रहे हैं। ठीक है आज की पीढ़ी उसे याद करे क्योंकि उसने तेंदुलकर को ही खेलते देखा और सुना है।

पर मैं सुनील मनोहर गावस्कर को कैसे भूल जाऊँ? मैं तो तभी से उन्हें रेडियो/ट्रांजिस्टर पर सुनने लगा था जब उन्होंने पहला टैस्ट मैच खेलने के लिये मैदान में कदम रखा था।

सुनील गावस्कर क्या थे मैं यह नयी पीढ़ी को बताने के लिये मेरी यह पुरानी पोस्ट खोद कर लाया हूँ।

तो आइये आप भी जानें कि वे क्या थे।

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● पिच पर खून 😮

जब तक बल्लेबाज का खून पिच पर नहीं गिर जाता तब तक मुझे मजा नहीं आता है।

-लिली, आस्ट्रेलिया के खूँखार गेंदबाज

ऐसे और नाम

थॉमसन
एंडी रॉबर्ट
माइकल होल्डिंग

कुछ और भी ऐसे तेज गेंदबाज होते थे जिनसे बल्लेबाजों की पिंडलियां काँपा करती थी। ऊपर से तब बाऊंसर फैंकने की सीमा नहीं होती थी। उस समय यह भी नहीं देखा जाता था कि बल्लेबाजी कर रहा खिलाड़ी कौन है और वह किस स्तर का बल्लेबाज है। इन तेज गेंदबाजों को तो बल्लेबाज का सिर फोड़ना और जबड़ा तोड़ना था तो बस तोड़ना था।

एक बार पाकिस्तान में भारत और पाकिस्तान में टेस्ट मैच चल रहा था। उस समय भारतीय टीम के कप्तान बिशन सिंह बेदी होते थे और हमारी टीम के 8 विकेट गिर चुके थे। मतलब तब हमारे अनाड़ी और पुछल्ले बल्लेबाज खेल रहे थे ऊपर में शाम का समय होने के कारण मैदान पर रौशनी भी कम हो गयी थी। मगर फिर भी पाकिस्तान के तेज गेंदबाज बार-बार बाउंसर पर बाउंसर फैंके जा रहे थे। तब बेदी ने इस पर ऐतराज जताया तो भी वे गेंदबाज मान नहीं रहे थे। आखिर इसके विरोध में कप्तान बेदी ने अपने दोनों बल्लेबाजों को पेवेलियन में बुला कर पारी समाप्ति की घोषणा कर दी थी या यह कहें कि उन्हें ऐसा मजबूरी में करना पड़ा था। क्योंकि बाउंसर लगने से किसी पुछल्ले बल्लेबाज का सिर फूट जाता या जबड़ा टूट जाता तो फिर अगली पारी में गेंदबाजी किससे करवाई जाती।

अब आते हैं सुनील मनोहर गावस्कर पर

गावस्कर ऊपर लिखे खौफनाक गेंदबाजों के आगे भी हेल्मेट तक भी नहीं पहनते थे तो फिर wrist guards भी क्यों पहनने।

एक बात और

उस समय इतने वीडियो रिकॉर्डर नहीं होते थे कि जिनमें खुद के खेलते हुए की और दूसरे गेंदबाजों की वीडियो बार-बार देख कर अपनी कमियों और दूसरे गेंदबाजों की खूबियों को समझा जा सके।

पर गावस्कर तो बस गावस्कर थे। जितनी बेरहमी से उन्होंने ऊपर लिखे गेंदबाजों को धोया था उस समय शायद ही कोई दूसरा बल्लेबाज कर पाया होगा।

उस समय गावस्कर विकेटों के आगे चट्टान की तरह डटे रहते थे। उनके आउट होते ही सारे देश के रेडियो/ट्रांजिस्टर शाँत हो जाते थे।

तब उन्हें लेकर यह बोला जाने लगा थाः

चारपाई खड़ी कर दो

मतलब विकटों के रहते तो यह बंदा बोल्ड होने से रहा। हाँ विकटों की जगह इनके पीछे यदि चारपाई खड़ी कर दी जाये तो शायद ये बोल्ड हो जायें।

स्ट्रेट ड्राइव

जब वे अपने बल्ले को 45° पर झुका कर गेंद को छू भी देते थे तो वह गेंदबाज के बिलकुल पास से इतनी तेजी से सीमा रेखा को पार कर जाती थी कि बस वह देखता ही रह जाता था।

झोटा छाप बल्लेबाजी

मतलब ताकत लगा कर बल्लेबाजी करना। पर गावस्कर ने ऐसा कभी नहीं किया था। वे तो बस कलाइयों के जादू से ही खेला करते थे जिसका प्रमाण उनके द्वारा लगाये गये स्ट्रेट ड्राइव और कवर ड्राइव हैं। 

सर आप इतने स्ट्रेट ड्राइव क्यों लगाते हैं?

जब एक पत्रकार या किसी और बंदे ने उनसे यह प्रश्न पूछा तो उनका यह उत्तर थाः

'मैं बचपन में अपनी गली में क्रिकेट खेलता था तो मेरी माँ मुझे गेंद फैंकती थी। गली अधिक चौड़ी नहीं थी तो मुझे रन बनाने के लिये गेंद को सीधा सामने की ओर ही खेलना होता था। तो मुझे स्ट्रेट ड्राइव लगाने की आदत ही पड़ गयी थी।

सचिन तेंदुलकर v/s विराट कोहली

पिछले कुछ दिनों से इस पर बहुत लिखा जा रहा है।

वास्तव में बात यह है कि गावस्कर, तेंदुलकर और कोहली के क्रिकेट का समय अलग-अलग रहा है तो उस समय और आज की परिस्थितियों में भी बहुत अंतर है। गावस्कर के समय केवल 5-6 देश ही क्रिकेट खेला करते थे तो मैच और सीरीज बहुत कम होती थी। जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि उनके समय में वीडियो कैमरे और वीडियो इतने नहीं होते थे जिन्हें बार-बार देख कर अपनी कमियों और दूसरी टीम के खिलाड़ियो की कमजोरियों का पता लगाया जा सके।

एक बात और

तब रात को पिच को कवर से ढका नहीं जाता था। मतलब ओस से गीली पिच और ऊपर से उन खूँखार गेंदबाजों को झेलो।

लगे हाथ यह बात भी याद आ गयी।

आउट होने के बाद गावस्कर ने एंपायर की उठी उँगली को देखना तो दूर की बात कभी उसकी ओर भी देखा तक नहीं था। बस आउट होते ही बल्ले को बगल में दबाया पेवेलियन की ओर चल पड़े।

एक बार भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ विवाद हो गया था तो जाने माने लेखक खुशवंत सिंह ने अपने एक लेख में यह लिखा थाः

'यदि लता मंगेशकर, गावस्कर और सचिन तेंदुलकर में से कोई भी पहल कर ले तो पाकिस्तान उनकी बात को तुरंत मान जायेगा।'

पाकिस्तान तक में खेल से रिटायरमेंट लेने के बाद भी सुनील गावस्कर का इतना सम्मान होता था।

किसी भाई ने एक पोस्ट में यह कहा है कि यदि आज के बल्लेबाज (चाहे वह विराट कोहली ही क्यों न हो) पुरानी परिस्थितियों में उन खूँखार गेंदबाजों को खेलते तो वे गेंदबाज उन्हें 'तू चल मैं आया' की धुन पर ताथैय्या-ताथैय्या करवा देते।

■ दो से अधिक बाउंसर नहीं। छोटे मैदान और नो बॉल पर फ्री हिट। पावर प्ले और एक ही पारी में दो गेंदों का प्रयोग। इन नये नियमों ने क्रिकेट को क्लासिकल डाँस की जगह बारात में घोड़ी के आगे डाँस करना बना दिया है।

✍️ अनिल कौशिश ji

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