रज़ाई----सर्दियों में रज़ाई को कम्बल से ज़्यादा तवज्जो हासिल है,तभी इस्मत चुग़ताई

रज़ाई----सर्दियों में रज़ाई को कम्बल से ज़्यादा तवज्जो हासिल है,तभी इस्मत चुग़ताई ने कहानी 'लिहाफ़' लिखी।वरना वो चाहतीं तो लिहाफ़ की जगह उसका नाम 'कंबल' भी कर सकती थीं और कंबल में भी उन बातों का ज़िक्र कर सकती थीं जो उन्होंने अपनी कहानी लिहाफ़ में किया।कंबल में भी समान रूप से वही चीज़ें हो सकती हैं जो उनकी कहानी में लिहाफ़ में थीं,कंबल भी तो एक गर्म पर्दा ही हुअा जैसे कि लिहाफ़ है।रज़ाई का महत्व कंबल से ज़्यादा ही है क्योंकि बॉलीवुड के गाने 'सईंयाँ के साथ मड़ईया में,बड़ा मजा आवै रजईया में' रजाई का इस्तेमाल हुआ है।कवि चाहता तो उस गाने को यूँ भी कर सकता था कि 'सईंयाँ के साथ कंबलवा में,बड़ा मजा आवै दंगलवा में'।तब भी सुनवईया को वही फ़ीलिंग आती।कंबल का जुड़ाव सूफ़ी मनश और साधु किस्म के लोगों से माना जाता है,कंबल को थोड़ा रफ़ एंड टफ़ माना जाता है,साधु के कांधे पर कंबल होता है,रज़ाई नहीं होती,कंबल यात्रा का भी साथी होता है।जबकि रज़ाई से स्थायी भाव आता है,रज़ाई यात्री नहीं लगती,रज़ाई विलासिता का प्रतीक लगती है।बहरहाल,कंबल के अपने मज़े हैं तो रज़ाई के अलग।ख़ूब पास-पास तगी मोटी रेशमी रज़ाई ओढ़ने का सुख उसे ही पता है जिसने ओढ़ी हो।पहले सर्दियाँ आने से पहले धुनियाँ घर-घर घूमने लगते और लिहाफ़ की रूई धुन दिया करते।हर बरस रूई को धुनवाकर ही लिहाफ़ का इस्तेमाल करने का दस्तूर था।अब ये नियम बहुत से लोग तोड़ देते हैं,लिहाफ़ नहीं धुनवाते,बरसों तक यूँ हीं बिना धुनवाए ओढ़ते रहते हैं,कई लोग तो सर्दियाँ आने से पहले और सर्दियों में बीच-बीच में भी लिहाफ़ को धूप नहीं दिखाते।बिना धुनवाए और धूप दिखाए लिहाफ़ रोगों के वाहक होते हैं।सिर्फ़ खोल बदलना पर्याप्त नहीं,लिहाफ़ की धुनाई ज़रूरी है।धुनियाँ फेरी लगाने नहीं अाते तो धुनियाँ की दुकान पर ही भेजकर लिहाफ़ धुनवा लेना चाहिए।बिना धुने लिहाफ़ सांस के रोगों का भी कारण बनते हैं,इस वजह से भी पुराने ज़माने के लोगों ने लिहाफ़ की धुनाई का दस्तूर बनाया।लिहाफ़ हमेशा असली रूई का ही ओढ़ना चाहिए,सिंथेटिक रूई का नहीं।आजकल सिंथेटिक रूई के पतले लिहाफ़ों का भी ख़ूब चलन हो गया है जो जयपुरी रज़ाई के नाम पर बिकते हैं और नकली होते हैं।इसी तरह चाइनीज़ कंबलों के इस्तेमाल से बचना चाहिए,वो भी सिंथेटिक होते हैं और हानिकारक होते हैं।बहरहाल,रज़ाई से जुड़ी एक घटना याद आ रही है।दो बरस पहले हमारे एक परिचि सुबह सुब मिलने आए।चाय पीते हुए और नमकीन टूंगते हुए कहने लगे कि इस साल की सर्दी भी निकल गई।बीवी के लिए गांधी आश्रम से नर्म और मोटी रजाई ख़रीदने की चाहत इस बार भी धरी रह गई।क्या बताएं तनख़्वाह मिलती है तो बच्चों की फ़ीस भरने में,मकान का किराया देने में और बिजली समेत तमाम बिल चुकाने में ही ख़त्म हो जाती है,कुछ बचता ही नहीं।रिश्वत लेने से हमें सख़्त नफ़रत है।हाय रे मेरी बीवी,बिना रजाई ही हर बार काट देती है सर्दी।जो एक रजाई दहेज में लायी थी वो हमने एक सर्दी में अस्पताल में भर्ती रिश्तेदार को इमरजेंसी में ओढ़ने के लिए दे दी थी,रिश्तेदार वही रजाई ओढ़े चल बसा।अब वो रजाई वापस तो ली नहीं जा सकती थी।तब से नई रजाई लेने की सूरत ही नहीं बनी।कोई बात नहीं,अगली सर्दी में तो लेकर ही रहेंगे।ये सुन हमने कहा कि पूरी सर्दी बीत गई लेकिन हमने भी गांधी आश्रम की रजाई नहीं ओढ़ी।परिचित ने हैरत से कहा कि आपको क्या दिक्कत है।हमने कहा कि हम जयपुरी रजाई ओढ़ते हैं या कंबल सटाकर ओढ़ते हैं,गांधी आश्रम की रजाई हमें भारी लगती है।बहरहाल,मेरे पास एक नई रजाई रखी थी,हमने सोचा था कि परिचित जी को भेंट कर दें,लेकिन फिर ख़्याल आया था कि कहीं परिचित जी नाराज़ ना हो जाएं कि तुम कौन होते हो मेरी बीवी को नरम-गरम रजाई देने वाले।फिर हमने ये भी सोचा कि ऐसा करते हैं कि उन्हें रजाई लायक नकद ही दे देते हैं,लेकिन ख़्याल आया कि परिचित जी समझ जाएंगे कि ये रक़म उन्हें क्यों दी जा रही है,नाराज़ हो जाएंगे,वजह कि उनका ख़ुद्दारी का लेवल बहुत हाई है।ख़ैर,परिचित जी चले गए।हमने सोचा कि ऐसा करते हैं कि चेले को भेजकर उनके गेट के अंदर एक रजाई फेंकवा देते हैं,फेंककर भाग आएगा,किसे पता चलेगा कि किसने रजाई फेंकी।लेकिन फिर ख़्याल आया कि कहीं परिचित जी शक ना कर जाएं कि ये मेरी हरकत हो सकती है।या फिर वो हमारे ऊपर शक ना करें तो कहीं अपनी बीवी पर ये कह नाराज़ ना हो जाएं कि बता तेरे किस यार ने तेरे लिए रजाई फेंकवायी है,बवाल हो जाएगा।बहरहाल,परिचित जी की हम किसी तरह से रजाई के मामले में हेल्प नहीं कर सके,बस दुआ कर दी थी कि ईश्वर उनको अगले बरस रजाई बख़्श दे।पता नहीं दुआ कबूल हुई या नहीं,परिचित जी से उसके बाद दोबारा भेंट नहीं हुई है।

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