रमज़ान सन 8 हिजरी में मक्का फतेह हुआ और उसके बाद एक दो महीने में हुनैन और

रमज़ान सन 8 हिजरी में मक्का फतेह हुआ और उसके बाद एक दो महीने में हुनैन और तायफ़ भी । इन तीनों फतेह से एक धाक बैठ गई अरब के दूसरे कबीलों क लगा कि अब इस्लाम के शरण में जाए बगैर चारा नहीं है 

उस समय कुरान के शब्दों में लोग फौज दर फौज इस्लाम में दाखिल होने लगे मदीना आना और रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम से मिलना लोगों का सबसे बड़ा शौक था 

लेकिन बहुत से लोग ऐसे थे जो इस्लाम की बढ़ती शान व शौकत देख कर इस्लाम लाए थे उनके दिल में इस्लाम दाखिल नहीं हुआ था 

इस लिए जब उन्होंने अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम की बीमारी और फिर वफात की ख़बर सुनी जितनी तेजी से वह इस्लाम में दाखिल हुए थे उतनी ही तेज़ी से वापस निकल गए कुछ लोगों ने नबुव्वत का दावा कर दिया , कुछ दोबारा कुफ्र की तरफ वापस हो गए और कुछ लोगों ने रियासते मदीना को जकात देने से इंकार कर दिया 

नौबत यहां तक पहुंच गई कि वह इस्लाम जो अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम के जमाने में कई लाख वर्ग किलोमीटर में फैल गया था सिमट कर सिर्फ तीन शहरों मक्का मदीना और तायफ तक बाकी रह गया बीच में कुछ छोटी छोटी आबादियां इस्लाम पर बाकी ज़रूर रही लेकिन उनकी संख्या बहुत कम थी, उधर बाहरी ताकतें भी हमला करके मदीना की रियासत को खत्म करने के फिराक में थीं 

ऐसा लग रहा था कि अब इस्लाम या तो खत्म हो जाएगा या अरब के एक छोटे से क्षेत्र तक सिमट जाएगा लेकिन अल्लाह को यह मंजूर नहीं था अल्लाह अपने पसंदीदा दीन को इतनी जल्दी खत्म होते नहीं देख सकता था उसने दोबारा इस्लामी रियासत को उसी शान से खड़ा किया और उस ने यह काम हज़रत अबू बकर सिद्दीक से लिया 

हज़रत अबू बकर सिद्दीक की ख़िलाफत सिर्फ सवा दो साल रही इतनी छोटी मुद्दत में न सिर्फ तमाम बगावत को खत्म कर दिया बल्कि इराक़ का आधा से ज्यादा हिस्सा और मुल्क शाम के कुछ हिस्सों पर इस्लाम का परचम लहरा दिया इतनी छोटी मुद्दत में इतने बड़े काम अंजाम दिए कि उस की मिसाल सिर्फ इस्लामी इतिहास में ही नहीं दुनिया के इतिहास में बहुत कम मिलती है

इस्लामी रियासत की बुनियाद नबी करीम सललाहो अलैहे वसल्लम ने डाली थी उसकी कुर्सी हज़रत अबू बकर सिद्दीक ने बांधी और इतनी मजबूत बांधी कि बाद वालों के लिए दीवार खड़ी करना आसान हो गया 

इस बात को खुद हज़रत उमर ने बार बार स्वीकार किया है हज़रत उमर हज़रत अबू बकर सिद्दीक से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने हज़रत अबू बकर सिद्दीक के काम में कोई तब्दीली नहीं की सिवाय हज़रत खालिद बिन वलीद से सेना का नेतृत्व वापस लेने के , हज़रत अबू बकर सिद्दीक के दूसरे कामों पर पोस्ट फिर कभी 

रज़िल्लाह अन्हुम अजमईन 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जयपाल सिंह मुंडा झारखंड के खूंटी जिले में जन्मे थे. ( 3 जनवरी 1903 – 20 मार्च 1970). वे एक जाने माने राजनीतिज्ञ, पत्रकार, लेखक, संपादक, शिक्षाविद् और 1925 में ‘ऑक्सफर्ड ब्लू’ का खिताब पाने वाले हॉकी के एकमात्र अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी

راہ عزیمت کا مسافر(مجاہد دوراں سید مظفر حسین کچھوچھوی)

सुनील गावस्कर ने कहा है कि विराट कोहली के IPL में शतकों की बौछार के