वाह वाह #विक्रमादित्य सही जवाब दिया. लेकिन मैंने कहा था जैसे तू

वाह वाह मान गया आखिर तूने मुझे पकड़ ही लिया. विक्रमादित्य तुममें बहुत शक्ति है. मैं तो बेताल हूँ अगर तू चाहे तो अपनी शक्ति से रोमन साम्राज्य को भी परास्त कर सकता है. 

मुझे पता था वह ज्ञानी बौद्ध भिक्षु जरूर मेरे पास तुझे भेजेगा. मुझे उठाकर चलते हुए तू थकेगा तो नही ? मगर ऊब जरूर जाएगा. बात तो तू मुझसे कर नही सकता. क्यों कि जो ही तूने बात की मैं उड़कर अपनी जगह पहुंच जाऊंगा.

मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ, रास्ता भी कट जाएगा. तो सुन कहानी आज से 1500 साल बाद यानी साल 1901 की बात है. भीम राव आंबेडकर नाम का बालक सतारा में रहा करता था. उसके पिताजी गोरेगांव नाम के स्थान में खजांची की नौकरी करते थे.

पिता ने गोरेगांव में गर्मियों की छुट्टियां बिताने के लिए बच्चों को खत लिखा. भीम राव आंबेडकर, उनके बड़े भाई और उनके बहन के दो बच्चे जो उन्ही के साथ सतारा रहते थे गोरेगांव जाने के लिए उत्साहित हो गए.

चारों ने गोरेगांव जाने के हर्ष उल्हास में नए कपड़े, नए जूते खरीदे. उन्हें सबसे ज्यादा खुशी इस बात की थी कि वे चारों रेलगाड़ी से जा रहे थे. उस समय तक उनमें से किसी ने रेलगाड़ी देखी तक नही थी.

चारों ने नए कपड़े जूते पहन कर अपना निर्धारित सफर शुरू कर दिया. स्टेशन घर से दूर था, स्टेशन तक जाने के लिए तांगा किया. चारो समय पर स्टेशन पहुंच कर मसूर तक का रेल टिकट खरीद लिया. गोरेगांव जाने के लिए मसूर सबसे निकट स्टेशन था.

थोड़ी देर में रेलगाड़ी आ गयी. चारों बच्चे आने वाले खतरे, अपमान, और अमानवीय पीड़ा से अनजान ख़ुशी ख़ुशी रेलगाड़ी में चढ़ गए. रेलगाड़ी शाम को पांच बजे मसूर पहुंची. चारो बच्चे अपना समान लेकर उतर गए.

कुछ मिनटों में रेलगाड़ी से उतरे सभी यात्री आपने अपने गंतव्य पर जा चुके थे. लेकिन चारो मासूम बच्चे इस प्रतीक्षा में प्लेटफार्म पर खड़े थे कि उनके पिताजी आएंगे या फिर उनका चपरासी आएगा.

घण्टों बीत गए कोई लेने नही आया. स्टेशन मास्टर बच्चों से पूछताछ करने आया. बच्चों ने स्टेशन मास्टर को सारी आपबीती बताई. स्टेशन मास्टर को लगा बच्चे उच्च जाति अर्थात देवताओं के पुत्र हैं. कारण चारो बच्चों ने बेहतरीन कपड़े पहनने थे.

लेकिन स्टेशन मास्टर ने अचानक से बच्चों से उनकी जाति पूछ ली. बिना देर किए भीम राव अंबेडकर ने कहा हम महार जाति से हैं. इतना सुनते ही स्टेशन मास्टर स्तब्ध रह गया. उसके चेहरे की रंगत उड़ गई. फिर भी उसने चारो बच्चों को बैलगाड़ी दिलाने में मदद की. लेकिन स्टेशन मास्टर के कारण स्टेशन के बाहर सभी बैलगाड़ी वालों को पता चल गया था चारों बच्चे महार हैं.

सभी बैलगाड़ी वालों ने गोरेगांव चलने से इनकार कर दिया. कहा हम अछूतों को बैठाकर धर्म भ्रष्ट नही करना चाहते. चारो बच्चों सोच में पड़ गए उनके साथ इनका बुरा बर्ताव क्यों किया जा रहा है.

एक बैलगाड़ी वाला इस शर्त पर चलने को राजी हुआ कि वह दुगना भाड़ा लेगा और बैलगाड़ी बच्चे खुद चलाएंगे और वह बैलगाड़ी से नीचे चलेगा. इस तरह उसके अपवित्र होने डर नही होगा.

चारो बच्चों में से एक ने बैलगाड़ी की लगाम आपने हाथ मे थाम ली. बैलगाड़ी का मालिक बैलगाड़ी के बगल में पैदल ही चलने लगा.

रात्रि होते होते बैलगाड़ी चुंगी की चौकी पर पहुंची. चारो बच्चे प्यासे थे. अछूत होने के कारण चुंगी लेने वाले ने पानी देने से इनकार कर दिया.

किस तरह दूसरे दिन बच्चे गोरेगांव पहुंच गए. पिताजी चारो बच्चों को देखकर चकित रह गए. उन्होंने कहा उनके आने की कोई सूचना उन्हें नही मिली. गलती चपरासी की थी आने की सूचना वाला पत्र वो देना भूल गया. बहरहाल इस घटना ने चारो बच्चों विशेषकर भीम राव अंबेडकर के मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ी.

कहानी खत्म विक्रमादित्य अब तू सवाल का जवाब दे. स्टेशन मास्टर, गाड़ीवान और चुंगीवाले हिंदुइज्म को मानने वाले थे या हिंदुत्व को ?

बोल विक्रमादित्य, जवाब दे तू तो बड़ा बुद्धिमान है न. जवाब दे नही तो तेरे सर के टुकड़े टुकड़े कर दूंगा.

विक्रमादित्य :- सुन बेताल बाबा सारे मनुष्य अपने अपने धर्म संस्कृति और प्रथा अनुसार आचरण करते हैं. सभी मनुष्यों को चलाने वाला इनका मालिक धर्म, संस्कृति और प्रथा है. मनुष्य तो धर्म संस्कृति और प्रथा का सेवक है.

स्टेशन मास्टर, गाड़ीवान और चुंगीवाला हिंदुइज्म धर्म को मानने वाले थे. कारण 1901 में हिदुत्व नही था. हिंदुत्व का जन्म सावरकर ने 1923 में किया. हिंदुइज्म हो या हिंदुत्व दोनों में वर्ण व्यवस्था और जातिवाद है.

स्टेशन मास्टर, गाड़ीवान और चुंगीवाला तीनों हिंदुइज्म धर्म का पालन करते हुए जातिवाद कर रहे थे. 

बेताल :- वाह वाह वि वाह वाह विक्रमादित्य सही जवाब दिया. लेकिन मैंने कहा था जैसे तू क्रमादित्य सही जवाब दिया. लेकिन मैंने कहा था जैसे तू बोलेगा मैं उड़ जाऊंगा. मैं चला विक्रमादित्य उड़ कर अपने पुरानी जगह पर 




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