#मीलाद

#मीलाद

याद है मेरे बचपन में गांव में महीने में एक दो बार किसी न किसी के घर में मीलाद हुआ करती थी। जिस दिन मीलाद होना होता था उस दिन शाम को छोटे छोटे बच्चे पूरे गांव में चिल्ला चिल्ला कर मीलाद का बुलव्वा देते थे कि फलां के घर में मीलाद का बुलव्वा है।

ईशा बाद गांव के मर्द औरत बच्चे उस घर के दरवाजे इकट्ठे हो जाते थे मर्दों के लिए अलग और औरतों के लिए अलग टाट बिछा दिए जाते थे...

एक चौकी में लालटेन जलाकर रख दी जाती थी पढ़ने वाले लोग चौकी के आस पास बैठ जाते थे और सब लोग मीलाद पढ़ते थे। एक दो घंटे पढ़ने के बाद खड़े होकर सलाम पढ़ा जाता था फिर बताशे बांटे जाते थे। बताशे बांटने के लिए बताशों का तसला ऐसे आदमी को दिया जाता था जो रसूली बांट बांटे, खुदाई बांट नहीं... यानी की किसी को कम ज्यादा न दे सबको बराबर दे।

कुछ दिनों बाद गांव में कुछ ज्यादा पढ़े लिखे लोग पैदा हुए और उन्होंने मीलाद के बाद खड़े होकर सलाम पढ़ने पर ऐतराज जताना शुरू किया.. जिससे सलाम बैठे बैठे ही पढ़ी जाने लगी....

कुछ दिनों बाद और ज्यादा पढ़े लिखे लोग पैदा हुए और उन्होंने सलाम पढ़े जाने पर ही ऐतराज शुरू कर दिया। उनकी नजर में सलाम पढ़ना ही ग़लत था। कुछ मीलादों में इसमें भी वाद विवाद हुआ और फिर.....

माशाल्लाह गांव में मीलाद होना ही बंद हो गई...

अब कभी सुनने में आता ही नहीं कि किसी के यहां मीलाद है। महीने दो महीने में मीलाद होती थी, पूरे गांव के बच्चे बुजुर्ग औरतें सब इकट्ठे होते थे इससे आपस में एकता भी फैलती थी और लोग दीन भी सीखते थे।

खैर अब मीलाद तो नहीं होती मगर साल में एक दो बार नाच गाने का प्रोग्राम जरूर हो जाता है इसमें किसी को ऐतराज भी नहीं होता। सब मिलकर एक सुर में थिरकते हैं लौंडिया लंडन से लाएंगे रात भर डीजे बजाएंगे।

बढ़िया है। हमेशा वही काम होने चाहिए जिसमें किसी को ऐतराज न हो।


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