मुझे सबसे ज़्यादा हँसी आती है जब लोग कहते है क्रिकेट एक व्यवसायिक गेम है।

मुझे सबसे ज़्यादा हँसी आती है जब लोग कहते है क्रिकेट एक व्यवसायिक गेम है।
अरे फिर फुटबॉल, बास्केटबॉल, गोल्फ़ वगैरह क्या है???
कहते है क्रिकेट की वजह से दूसरे खेल नज़रंदाज़ होते है, अरे तो दुनिया भर में फुटबॉल की वजह से भी ऐसा होता है, इंग्लैंड जैसे देश जहाँ से क्रिकेट की शुरुआत हुई वहाँ भी क्रिकेट फुटबॉल से ज़्यादा फेमस नही है।
अरब देशों में जहाँ अलग अलग खेल उनकी पहचान थे वहाँ भी अब फुटबॉल ही फेमस है।।
कोई क्रिकेटर कभी फुटबॉल की लोकप्रियता से परेशान नही होता।
बाकी बचपन में जो आई स्पाइ, लूडो, चिड़िया उड़, वगैरह खेलते आएं है वो तो क्रिकेट की बुराई करेंगे ही, सीधी सी बात है, क्रिकेट खेलने के लिए आपको घर से बाहर निकलना पड़ता है, अब घर में रहने वाले लड़के इस खेल से महरूम रहते है तो जवानी में फ्रस्टेशन निकालते है।।
रही बात व्यावसाय की तो फेसबुक, फ़िल्मे, रजनीति सब व्यवसाय ही है, दूसरे खेलो से मोह है तो उनकी बात करिये, 

मैंने इसी फेसबुक पर सैंकड़ो लड़कियों को देखा नीरज चोपड़ा को क्रश बताते हुए, ज़्यादातर लड़कियाँ उसपर पागलों को तरह फ़िदा थी 
ध्यान दीजिए यहाँ भी जेवलिन से प्यार नही था, एक व्यक्ति से प्यार था जिसने गोल्ड जीता, अगर जेवलिन से प्यार होता तो आप उस खेल की आज भी बात करते। 
मुझे याद है ऋतिक रौशन के पीछे लड़कियां दीवानी थी औऱ जैसे उसने शादी की सारी दीवानगी ख़त्म, जिस दिन नीरज चोपड़ा शादी कर लेगा आधे लोगों का क्रश कोई और हो जाएगा।

धीरे धीरे वैसे भी नीरज चोपड़ा ग़ायब हो रहे, ऑलमोस्ट गायब हो चुके है, गायब होने की वजह सिर्फ इतनी है कि हम जेवलिन थ्रो के बारे में बहुत अच्छे से नही जानते, 
ये हमारी रग- रग में नही बसा है, उसका गोल्ड हमारे लिए उत्सव या त्योहार जैसा था, हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी नही।

मुझे याद है वेस्टइंडीज टीम लारा के वक़्त बहुत बुरें हाल में थी उस वक़्त रिचर्ड्स से जब वेस्टइंडीज़ क्रिकेट की बदहाली के बारे में पूछा गया तो उसने सीधे कहा अमेरिकन टीवी, 
क्योंकि जब टीवी पर अमेरिकी प्रोगाम आने लगे तो वेस्टइंडीज़ के लोगों को बॉलीवॉल बेसबॉल में दिलचस्पी होने लगी।

लेकिन याद रखिये वेस्टइंडीज में क्रिकेट आत्मा की तरह है, ये बुरा दौर ज़्यादा साल नही चल पाया, 
कुछ सालों बाद फिर से वेस्टइंडीज़ में नए नए टैलेंट्स आने लगे।

यही हाल इंग्लैंड का था आर्थटन की कैप्टशनिप का दौर था और इंग्लैंड बहुत बुरें दौर में थी, 
लोग कहने लगे दुनिया को क्रिकेट देने वाले मुल्क से ही क्रिकेट खत्म हो रहा और वक़्त ऐसा आएगा कि इंग्लिश टीम जिम्बाब्वे हो जाएगी।

मगर याद रखिये इंग्लैंड में क्रिकेट किसी सम्मानित प्रोफेसर की तरह है और कुछ सालों बाद इंग्लैंड अपने उसी पुराने रँग में लौट आया। 

इसलिए खेलो में मुकाबला मत करें, हर खेल को पसंद करें वैसे ही जैसे बगीचे में हर तरह के पेड़ पौधे होते है, कुछ छोटे कुछ बड़े, कुछ सुगंधित कुछ फलदार।

नीरज चोपड़ा का पसंद कीजिये पर उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है उसका खेल पसंद करना, 

मान लो वो गोल्ड न जीत पाता और गोल्ड किसी और भारतीय को तीरंदाज़ी में मिल जाता तो वो क्रश हो जाता।

यानी खेल से ज़्यादा आपके लिए गोल्ड और व्यक्ति अहम है।

ज़रूरी है खेल से लगाव पैदा कीजिये, हमारी कॉलोनी में जो जश्न मना रहे थे वही लोग पार्क में पानी डलवा देते थे कि लड़के क्रिकेट और फुटबॉल न खेले, 

बाद में पार्षद से कहकर वहां पैदल चलने के लिए ट्रैक बनवा दिया, फूलों वाले पेड़ लगवा दिए, 
अब वहां बच्चे खेलते नही बल्कि बूढ़े लोग खाना खाने के बाद टहलते है। टहल तो आप सड़क पर सकते थे पर बच्चों की जगह आपने छीन ली।

ये दो दिन के हीरो बनाने वाली आदत छोड़िए, खेल से दिलचस्पी है तो खेल का माहौल तैयार कीजिये वरना क्या है सब कुछ बुलबुला।

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