वह #आदिवासी_लड़का जिसने 1960 में भारत के छत्तीसगढ़ को सुर्खियों में लाया और प्रतिष्ठित "#ऑस्कर" स्वीडिश निर्देशक अर्ने सक्सडॉर्फ की गोद में अपनी छोटी फिल्म शीर्षक - "#जंगल_सागा" को लाया,

वह #आदिवासी_लड़का जिसने 1960 में भारत के छत्तीसगढ़ को सुर्खियों में लाया और प्रतिष्ठित "#ऑस्कर" स्वीडिश निर्देशक अर्ने सक्सडॉर्फ की गोद में अपनी छोटी फिल्म शीर्षक - "#जंगल_सागा" को लाया, जिसमें एक "टाइगर बॉय' था जिसका किरदार नारायणपुर के #चेंदरू नाम के एक आदिवासी बच्चे ने निभाया था। 
नारायणपुर जगदलपुर से लगभग 90 किमी दूर स्थित है।

सन् 1960 का घने जंगलो से घिरा घनघोर अबूझमाड़ का बस्तर। पुरे बस्तर में फैला मुरिया जनजाति के लोगो का साम्राज्य इन घने जंगलो में चेंदरू नाम का 10 वर्षीय बच्चा खतरनाक #शेरों के साथ सहज तरीके से #खेल रहा था, अठखेलियाँ कर रहा था, पर उसे कहाँ मालूम था कि उसकी किस्मत किस करवट लेने वाली है।

उधर घने जंगलो का दौरा करते स्वीडिश #डायरेक्टर अर्ने सुक्सडोर्फ़ की नजर इस बच्चे पर पड़ी,जंगल में शेरों के साथ सहज दोस्ती डायरेक्टर को इतनी भा गई कि उनसे रहा नहीं गया। 
फिर तैयार हुआ एक ऑस्कर विनिंग फिल्म “जंगल सागा”। जिसमे लीड रोल पर था बस्तर का “#टाइगर_ब्वाय” चेंदरू।

1960 में चेंदरू ने #प्रसिद्धि का वो दौर भी देखा जो उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा। 90 मिनट की मूवी “जंगल सागा” जब पुरे #यूरोपीय देशों के सेल्युलाईड परदे पर चली तो लोग चेंदरू के दीवाने हो गए, चेंदरू #रातोंरात_हालीवुड_स्टार हो गया।

स्वीडन में चेंदरू ने जब वहां कि आधुनिक जिंदगी देखी तो किसी सपने से कम नहीं था। स्वीडन में चेंदरू कुछ सालों तक डायरेक्टर के घर पर ही रुका रहा। फिर वापिस भारत आ गया, तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल #नेहरूजी ने चेंदरू को मुंबई रुकने की सलाह दी। 
पर भीड़भाड की जिंदगी से दूर और पिता के बुलावे पर चेंदरू वापिस अपने घर आ गया जहाँ फिर उसकी जिंदगी अभावो से गुजरती हुई बीती।

सन 2013 में लम्बी #बीमारी से जूझते हुए इस गुमनाम हीरो की #मौत हो गयी । बस्तर की इस प्रतिभाशाली गौरवगाथा की याद में #छत्तीसगढ़_सरकार ने नया रायपुर के जंगल सफारी में चेंदरू का #स्मारक बना कर सच्ची श्रध्दान्जली दी थी।

चेंदरू कौन था....
वह चेंदरू मंडावी के नाम से जाना जाता था। वह "मुरिया" जनजाति का था और छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के गढ़ बंगाल का रहने वाला था। उसने एक #बाघ के बच्चे को #बचाया था और उसे घर ले आया और बाघ के साथ खेला जैसे कि कई बच्चे आधुनिक समय में अपने खिलौनों के साथ करते हैं। यह आश्चर्यजनक तथ्य उस समय देश भर के लोगों की बात बन गया और स्वीडिश फिल्म निर्देशक को एक लड़के और बाघ की दोस्ती के पीछे की कहानी का पता लगाने के लिए बस्तर आने के लिए प्रेरित किया।

एस्ट्रिड, सुक्सडॉर्फ की पत्नी ने बाद में "चेंदरू : द बॉय एंड द टाइगर" टाइगर बॉय पर एक #किताब लिखी थी जो उस समय की बेस्ट सेलर रही।

जीवन के बाद के वर्षों में, चेंदरू को पूरी तरह से गरीबी में अपना जीवन व्यतीत करना पड़ा और अंततः एक लंबी बीमारी के बाद 18 सितंबर, 2013 को उनकी मृत्यु हो गई। 
उनके दोस्त यशवंत रामटेके ने कहा कि उन्हें लकवाग्रस्त स्ट्रोक था, समर्थन पाने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइटों पर अपील की श्रृंखला उनके जीवन को नहीं बचा सकी।

वह शख्स जिसने न केवल क्षेत्र बल्कि देश को भी यूरोपीय सेल्युलाइड पर सुर्खियों में ला दिया था - उसकी मौत एक #अनजाने_नायक के रूप में हुई।

Cpd...

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